शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

दिल्ली और बिटिया

दिल्ली और बिटिया
जब से मेरे देश में दिल्ली से कांड होने लगे हैं
घर में रखे बिटिया के
खिलौने मुझे डराने लगे है
कब खिलौने छोटे हो जाये उसके
ऎसे खयाल अब मुझे सताने लगे है!
कैसे उसके सपनो को उड़ान भरने दू
जब मुझे उसके सपनो को
तोड़ने के बहाने मिलें हैं!
अपनी ही खुदगर्जी पर शर्मिन्दगी के
ख्याल अब मुझे आने लगे हैं
है चारों तरफ़ ऊँची-2 दिवारे
और आदमी के दिमाग में पैखाने मिले हैं!
बदल जाए ये मौसम
और नई रीत में नए जमाने बने
ऐसी अब हम दुआ मांगने लगे हैं
""देशबन्धु""

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