शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

  आज फिर हम शीशे में
  अपनी तावीर देखेंगे
  तुम्हारी खिंची लकीर देखेंगे
  लूट गयी जो अपनों के हाथों
  आज फिर हम अपनी
  वो तकदीर देखेंगे
 आज फिर हम तुम्हारी खिंची लकीर देखेंगे
 
  जमाने भर की बातें
  और उन बातों की बातें
  आज फिर हम
  हर अफवाह का असर देखेंगे
  आज फिर हम शीशे में
  तुम्हारी खिंची लकीर देखेंगे

 तुमने जो वादे किये थे
  उन वादों का और
  अपनी दुआओं का असर देखेंगे
 आज फिर हम शीशे में
  तुम्हारी खिंची लकीर देखेंगे
   अपनो और बेगानों में
  फर्क देखेंगे
  दिल में उमड़ते सैलाब का
  साहिल को बहा देना वाला
  वो मंजर देखेंगे
आज फिर हम शीशे में अपनी तावीर देखेंगे   देशबंधु”

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

मेरे शहर में मंदिर बहुत हैं
पर आज भी
एक अदद इंसान कि तलाश है मुझे ......!

लगते यहाँ रोज भंडारे हैं ...
गरीब कि भूख जो मिटा दे
उस शख्श की तलाश है मुझे ............!

रोशनी जगमगाती यहाँ हर शाम को
मिटा दे जो दिलों के अँधेरे ...
उस चिराग कि तलाश है मुझे ...........!

है भीड़, अजनबी , जाने पहचानों की
पर आज भी
अपनी पहचान कि तलाश है मुझे ......!

लिखने वालों की कमी नहीं यहाँ
वयाँ कर पाये जो सच को
उस शायर की तलाश है मुझे ........!

जहाँ भी जाए मंदिर है
पर उस तक जो जाए
उस राह की तलाश है मुझे ........!

शोर है हर बात का
जो पसरा सन्नाटा सुन पाये
उस राहगीर की तलाश है मुझे ....!

तलाश थकती नहीं
मैं थक जाता हूँ
ठिठकती है पर रुकती नही
आज "फिर वही तलाश है मुझे ".......!
"देशबंधु"

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

मालूम होता तो

जमाने के साथ
बदल जाने का
जरा सा भी
ख्याल होता तो
रिस्ते पर नाज न उठाते
रात इतनी ही
लम्बी होगी मालूम होता
तो चाहते आफताब न रखते
मुश्किल नहीं था
सफ़र मंजिले -जानिब
पर तुम नहीं रहोगे साथ
ख्याल होता तो
मंजिले -जानिब रफ़्तार ना लेते
खामोशियों से बेगाने
नहीं हैं हम
सिसकियों का दर्द
मालूम  होता तो
अपनों का साथ न लेते
फूल पत्ता -पत्ता बिखर जायेगा
मालूम होता तो
कभी तेरा दिया गुलाब ना लेते
सूख जाएगा रिस्तों का दरखत
मालूम होता तो
तमन्ना -ये बहार न रखते
गुजर जाती
हर लहर टकरा कर
गर हाथों में तेरे 
पतवार न होते तो 
चमक न पाते न सही
टिमटिमाते आसमां में जहाँ के
गर तुम कसूरवार न होते तो .......... 
"देशबंधु"