गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014
घाव जो दिल पर लगे हैं
उन्हें आंसू बनकर बह जाने दो
अभी मत छेड़ो नए नग़मे तुम
पुरानी ग़ज़ल को रूह तक उतर जाने तो दो
अभी मत लिखो नयी इबारत तुम
हथेलिओं की लकीरों को थोड़ा और उलझ जाने तो दो
बरसों तक बसा रहा चेहरा जो दिल में
उसे थोड़ा धुंधला हो जाने तो दो
मत देख ख़्वाब नए तू अभी
बरसों देखे जो ख़्वाब हमने मिलकर
रूह से मेरी
उन ख़्वाबों को निकल जाने तो दो ………………………………..|"देशबंधू"
बुधवार, 29 अक्टूबर 2014
खामोश पन्नों पर
जब भी अपना ग़म
उकेरना चाहता हूँ
पता नहीं क्यों?
तेरा सैलाब में डूबा चेहरा
सामने आता है
खामोश सा मेरा
ये दिल हर बार
क्यों ? तेरे गुनाहों की
सज़ा पाता है
पूछता हूँ दिल से जो सवाल
फिर से वो
सवाल ही बनकर
मेरे सामने क्यों ?आता है
करीब आते जब भी तुम
पता नहीं
हर बार मुझे ही
दरमियाँ हमारे फासला
नजर क्यों ? आता है
आसमां में तारे बेहिसाब हैं
फिर मुझे ही
ना जाने क्यों ?
टूटता तारा ही नज़र आता है
क्या ? लगाएं हिसाब मुहब्ब्बत का
मुझे तो हर बार
अपने खाते में
घाटा ही घाटा नज़र आता है..........................
देशबन्धु (टी. जी. टी.आर्ट्स )शिक्षा विभाग हिमाचल प्रदेश १
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
सोमवार, 27 अक्टूबर 2014
तेरे ही ख्याल से क्यों ?
शुरू होती है जिन्दगी
शाम होते - होते क्यों ?
तनहा हो जाती है जिंदगी
बिखर गए जो मोती
संभाल क्यों ?
नहीं पाती है जिंदगी
उजड़ गयी हर बस्ती याहं
फिर रेत के घरोन्दे क्यों?
बनाती है जिंदगी
हाथ पकड़ कर दूर छोड़ आये जो
उन्हें ही हमसफ़र क्यों ?
बनाती है जिंदगी
अश्कों के इस मौसम में
"बंधू" क्यों ? फिर से
मुस्कराती है जिंदगी
"देशबन्धु" टी. जी. टी. (आर्ट्स) हिमाचल शिक्षा विभाग
रविवार, 12 अक्टूबर 2014
तोड़ के हर बंधन
जब तोड़ के हर बंधन
दुनियाँ छोड़ जाऊंगा
ये बादा है मेरा
एक बार तेरी भी
आँखें नम कर जाऊँगा
गीले शिकवे तो बाद में
हर बात याद आएगी
जब क़तरा - क़तरा गुजरते
हर लम्हे में सांस थमती जायेगी
याद आएँगी वो मेरी खामोश निगाहें
पलकों के बीच बना तुम्हारा आशियाना
वो दिलों तक जाती
कभी लवों पर ना आती
मेरी खामोश दीवानगी
कोई याद करे न करे
बादा है के मेरे जाने पर तेरे
बेवफा दिल से भी
एक आह सी निकल जाएगी
चुप रहे जो हम
वो हमारे जज़बात थे
तुमने जो कही
वो तुम्हारे ख़यालात थे
चल नहीं पाये तुम साथ
तो कोई बात न थी
हम हमेशा अकेले ही रहे
ये सकूँ है दिल को बंधू"
वर्ना रुखसत जमाने से हो जाऊं
हँसते - हँसते
ऐसी मेरी औकात कहाँ..................................
देशबन्धु (टी. जी. टी. आर्ट्स) हिमाचल शिक्षा विभाग
सर्वाधिकार सुरक्षित
बुधवार, 8 अक्टूबर 2014
बेजार हूँ
बेजार हूँ तेरी दुनिया से
आकर यहां हमने क्या पाया
घूटी -घूटी साँसे और ग़मों का साया
गुजरा जो भी लम्हा हमें
जखम गहरे दे गया
आज हम तुम्हे
जखम गहरे दिखाएँगे
तेरी आँखों की तो बात ही क्या
पत्थर भी रोने लग जाएंगे
टूटा जो
आज खँडहर बनकर
अंजाम है तेरी ठोकरों का
कभी वो आलिशान मकां था
मेरी हसरतों का
कैसी ये मजबूरी है
एक सपने की खातिर हम
तन्हाई का बोझ ढोते हैं
मर तो कब के गए थे
तेरे लिए ही अपनी लाश ढोते हैं
कभी जो घर था तेरा
मेरा वो दिल
आज पीड़ा की मंडी है
उतर जाती जो खुमारी
तो हम भी जी लेते
वरना तो "वन्धु"छोड़ जाऊं दुनिया
इसी में अकलमंदी है ........................
देशबन्धु(टी.जी.टी.आर्ट्स )हिमाचल शिक्षा विभाग
सर्वाधिकार सुरक्षित
जब भी मैं रो लेता हूँ
जब भी मैं रो लेता हूँ
तेरे दिए जख्म सी लेता हूँ
जब भी तुम याद आते हो
ग़मों के ज़ाम चुपके से पी लेता हूँ
डर लगता जब तन्हाई से
तेरी तस्वीर को सीने से लगा लेता हूँ
जब भी बात तेरी चले महफ़िल में
महफ़िल से रुखसत हो लेता हूँ
बिखरे यादों के मोती
सिने में फिर संजो लेता हूँ
दिल जब भी बेवफा करार देता तुझे
मैं दिल को अनसुना कर देता हूँ
छूट गए जो वादे अधूरे कहीं
उन्हें हर बार
मैं अपनी किस्मत मान लेता हूँ
रो लेता हूँ जब भी मैं .................
तेरे दिए जख्म सी लेता हूँ १
देशबन्धु " टी .जी. टी. (आर्ट्स) हिमाचल शिक्षा विभाग
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
गमलों में उगने वाले लोग
गमलों में उगने वाले लोग
बरगद की बातें करते हैं
जो कभी हमारी बातें करते थे
आज जमाने भर की बातें करते हैं
कभी दिलों में रहने वाले
आज आशियाने की बाते करते हैं
कभी ऊंचा उड़ने बाले
आज आसमान में ठिकाने की बातें करते हैं
बेगाने हुए जो बर्षों से
वो मेरे अपने होने की बातें करतें हैं
खिलौनों के लिए रोने वाले
कैसे चाँद की बातें करते हैं
छोड़ गए थे जो सरे राह
ना जाने कैसे मिलन की बातें करते हैं
सूखे से इस सावन में
"बंधू" कैसे हम सैलाब की बातें करते हैं .................
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