मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

तारों की बस्ती में चाँद तनहा सा क्यों है ? पूछूं में तेरे दिल से कोई सवाल ये अरमान सा क्यों है ? बहारों के मौसम में बुझा बुझा सा गुलिस्तां और परेशान सा गुलफाम क्यों है ? वक़्त सरक गया जो हाथों से फिर मेरे हाथों की लकीरों में फिर तेरा नाम आज भी क्यों है ? मिट्ने का मेरे कोई हिसाब न था गुनहगारों में तेरा नाम आज भी क्यों है गुजर गयी रात चांदनी अलसाया सा चाँद क्यों है ? बहारों के इस मौसम में बंधू तू उदास सा क्यों है?
लड़खड़ाते मेरे कदम माँ तेरी उंगली ढूंढ़ते हैं संभल जब नहीं पाते तो तुझे ढूंढ़ते हैं नफरत से भरे इस जहाँ में न जाने आज भी हम माँ को क्यों ढूंढते हैं ? जमाने की ठोकरों की क्या बिसात ? मिटा दे जो बजूद मेरा आज भी हम माँ की दुआ का असर ढूंढते हैं है गर ज़माना शातिरों का रहनुमा तो क्या ? आज भी हम माँ में भगवान का अक्स ढूंढते हैं है तलाश जिन्हें शानो -शौकत की खुदा उन पर करम करे हम तो "बंधू " सदा माँ के चरणों में जन्नत ढूंढते हैं देशबन्धु (टी.जी. टी. आर्ट्स ) हिमाचल शिक्षा बिभाग सर्वाधिकार सुरक्षित