गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

उस पार


उस पार

क्षितिज के उस पार

हर पल अपना होगा

तेरा  ही अहसास होगा

  तुमसे  दूरी का दुःख होगा

तुम होगे , हम होगे

बस नहीं होगा तो

दुनिया का ख्याल होगा

बीते पलों के साये होंगे

 आने वाला हर हसीन

ख्याल होगा

बस जहां से रुखसत हो जाऊं

तो , तेरा मेरा

बस हमारा प्रयाणं होगा

अंधेरों कि इस भूलभुल्या में

भटक गया हूँ

दौड़ कर जाऊं

उस पार तो

बस चिर उजियारा होगा

हर गुजरती सांस

झिंझोड़ जाती है

क्षितिज के उस पार

तो बस सांस से परे का

अहसास होगा

बस होगा तो

 अधूरे पन  का ख़याल होगा

एक हो जाऊं तुमसे

तो बिखरने का

प्रयास होगा

"देशबंधु "

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

इन पत्थरों में


बहुत मुमकिन है

पत्थरों के

 इस शहर में

खामोश रहकर

में भी

फना हो जाऊं

जहाँ इतने सारे पत्थर हैं

वहां में भी

 पत्थर का खुदा

  हो जाऊं

बात अपनी कहने को

घुटन से

 पार पाने को

कोशिश जारी है

पथरों के इस शहर में

बेगानों के बीच

पत्थर बन जाऊं

तभी तो

गाँव की चौपाल

 ,माँ की रोटी

याद कर लेता हूँ

कितने दिन

 यादों के सहारे

पत्थर होने से

 बच पाउँगा

 मुझे पता है

खो गया हूँ

 इन पत्थरों में

पर पता नहीं है तो

बाहर जाने का वो रास्ता

जो सचमुच के खुदा

 तक जाता हो……………!

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

वो टूट रही है-----




अनायास ही बार- बार टूट्ती रही वो

आज भी बार- बार टूट रही है वो

टूटेगी वो फ़िर

वो चट्टान है बार- बार टूट्ती है

उसके टूटने से ना जाने कितने ही

पथरो को  अस्तित्व  मिला

हर बार जब भी पथर  अस्तित्व  मे आया

वो टूटी उसके लिये

उसके टूट्ने से जो पथर अस्तित्व  मे आये

उनको उसके टूट्ने से कोई हमदर्दी नही

वो टूटती रहे उनको क्या?

समाज मे सदियो से टूट- टूट कर वो

चट्टान बन गयी

टूटना उसका धरम बन गया है

कभी-कभी उसने भी टूट्ने मे ही महानता समझी

फ़िर चल पडी परम्परा टूट्ने की

टूटती जाये वो नीम्व की ईट बनने के लिये

कब ये समाज समझ सका उसके टूट्ने की गरिमा

इसी गम मे उसके टुट्ने की आवज आई

देश्बन्धु'"

मुहब्बत के


हमने मुहब्बत के कई तमाशे देखे हैं

दिल टूटते और ताजमहल बनते देखे हैं

बात दिलों की  करते - करते

लोग दिललग्गी  करते देखे हैं

गुजर जाते हैं जो लम्हे

उन्हें लोग याद करते देखे हैं

छोड़ जाते हैं जो राहे सफर में

हमने  लोग उनक़ी राह् तकते देखे हैं

जो कभी सदा ना दे

उनकी सदा सुनते हमने लोग देखे हैं

हमने मुहब्बत के कई तमाशे देखे हैं ...

साथ निभाने की कसमे खाने बाले

कसमो का हिसाब लगाते देखे हैं

चेहरा जो उनका देख् कर जीने बाले

आज मुँह फेरते  देखे हैं

जो बफा की हामी भरते थे

वो ही बेबफायी करते देखे हैं

ये तमाशा मुहब्बत का ही है बन्धु""

हमने तो गूँगे भी सूने में बातें करते देखे हैं

देशबन्धु""

आदत सी


सुख के साथ

दुःख की गति

अनवरत है

एक के साथ

दुसरे का आना

 नियति है

सिक्के के दो पहलू हैं

ये

 उछालोगे कभी तो

 हर दूसरी बार

चित के साथ पट भी होगी

सुख के आने पर

 दुःख दूर तक दिखता नहीं

 भ्रम होता है ये

 वो तो

 कभी अकेला रहता नहीं

 कभी जब

अपनों का दिया जख्म हरा हो

 तो उसकी इन्तहा होती है

वरना

तो जिंदगी को

 इसकी आदत सी हो जाती है ............

."देशबंधु"

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

दर्द है बाकी


तेरे  जाने  के बाद दूर तक
 तेरे क़दमों के निशान देखते रहे
 यकीन दिल को था तेरे ना आने का
 बस जगहसाई न हो जाये
 दिल को अपने दिलासा देते रहे
 अब न तो तेरे क़दमों के निशान है
 न ही अब कोई आश है बाकी 
 बाकी है तो बस इतना की
 सांसों में मेरी तेरे  नाम की
 आहट है बाकी ..............
 आँखों  में जहाँ सपने होते थे
 बस उस घरौंदे में अब
 धुंधला सा तेरा एक अक्श है बाकी
 अब न तो कोई गम है
 न ही दिल में कोई दर्द है बाकी
 जहाँ से कोई न आये
 वहां तेरा चले जाना
 उसकी दिल में एक कसक है बाकी
 अब मेरे पास तेरे लिए कुछ नहीं  
 कुछ है तो बस चंद शब्द है बाकी
 देशबंधु ""
  (अलसायी दोपहर में ........... स्वर्ग वासी मित्र की याद  में

 

आह ...........


उसकी सूनी आँखों में आज नींद नहीं थी ! पिछले २० वर्षों का हर लम्हा उसकी आँखों से चलचित्र की तरह गुजरने के लिए बेताब था ! उसे अच्छी तरह याद था जैसे ये कल की ही बात हो कैसे उसके बाबूजी ने उसे गुबारे बेचने बाली रेहड़ी पर अपने साथ काम करने के  लिए राज़ी किया था ! तब उसने अपने सारे अरमानों को बाबूजी  की इच्छा और उनकी मदद के लिए अपना बचपन दावं पर लगा दिया था ! उसे ये भी याद था की किस तरह उसके फेफड़े जबाब दे जाते थे कच्ची उम्र में १ आज उसके सामने बाबूजी बाले ही हालात उसके सामने सुरसा की तरह मुहं वाये खडे थे १ कभी -कभी उसे लगता था की बाबूजी की तरह वह भाग्यशाली नहीं था एक तो उसकी बेटियों की तरह वह और उसका भाई पढने में तेज नहीं थे दूसरा  उसकी तरह उसके बाबूजी की बेटियाँ नहीं  थी १ वो सुबह ही से परेशान था जब स्कूल जाती बार सीमा ने कहा था बाबूजी आपसे मेरे भौतिक शास्त्र  प्रवक्ता आपसे मिलना चाहते है! वो अभी रेहड़ी पर बैठा ही था की सीमा के मास्टरजी आ गए १ भले आदमी थे नमस्कार के बाद कांपती आवाज में उसने ही पूछा था की आप उससे क्यों मिलना चाहते थे ? मास्टरजी ने सीमा की भूरी -भूरी प्रशंसा करते कहा था मेघसिंह तुम अपनी बेटी को खूब पढ़ाना वो बहुत तेज है तेरी गरीबी को वो ही दूर करेगी !प्रशंसा में भी उसे चक्र आता लगा !उसे लगा जैसे अब जीवन चलाना भी कठिन हो जायेगा १ इतना दर तो उसे दूसरी बेटी के होने पर भी नहीं लगा था जितना आज लग रहा था १ हालांकि सीमा के मास्टरजी अपनी मदद की भी बात कर रहे थे ! अब उसे लगने लगा था की गरीब के घर बुद्धिमान का होना एक अभिशाप  से कम नहीं होता! अभी छोटी का भी तो सोचना था १दो जून की रोटी तो उसने भी खानी थी १
बाहर बडे जोर -जोर से कुतों के भौंकने के कारण उसकी तंद्रा टूटी तो पता चला की सुबह बस होने ही बाली थी ! ..................पर उसके जीवन में घना अन्धकार सुबह के साथ ही और गहराता जा रहा था……………। क्रमश :

shaaam

रविवार, 13 अक्टूबर 2013


वक्त बदला है तो हवा भी बदलेगी

मौसमे -बहार में तय है कि फिज़ा भी बदलेगी

चल छोड़ उदासी हौसला रख

ज़ख्म गहरा  है तो  दवा भी  बदलेगी

रात के लम्बा होने पर लाज़मी है टूट जाना

  सुबह के नूर से तक़दीर भी बदलेगी

 नजर लग गयी है मेरे वतन को

पर नज़र् बट्टू के आने से नजर भी बदलेगी

अब ना खुदा का  ना राम का घर टूटेगा

 अब दिलो के दरमियाँ की हर दीवार टूटेगी

हो ना हो बन्धु"" कभी तो हुक्मरानों की नीयत भी बदलेगी

""देशबंधु""

वक्त


चाहे मेरा मन पिछे मुड़ जाऊँ

एक बार फिर पाठ्शाला जाऊँ

सबक जिंदगी का जो ग़लत पढ लिया

उसे दुरुस्त कर आऊ

वक्त जो फिसल गया था रेत बनकर

फिसलने ना दूं साथ उसके दौड़ पाऊँ

चाहे मेरा मन पिछे मुड़ जाऊँ

सपनो का एक नया पन्ना हो

और हर एक हर्फ को में जी पाऊँ

छूट गए जो चलते- चलते

 सभी को साथ लेकर चल पाऊँ

बन्धु"" बदल दूं जिंदगी के हर लफ्ज को

जो गया वक्त लौटा पाऊँ

देशबंधु""

फना हो जाऊं तुम पर


बदल जाते हैं दोस्त भी जब वो राहें बदल देते हैं

हमारा क्या जिनकी राह् ही आप तक जाती हो

गुजरे जमाने की बात क्या करें अब

जब बात ही आप पर आकर ठहर जाती हो

गीला क्या करें पतवार के टूटने का

जब लहर ही साहिल पर पटक जाती हो

आरज़ू क्या करें अब आप से 

जब हर साँस फ़ासले बढ़ा जाती हो

बदल लेते हैं वो मज़मून ही बात का

जब बात हमारी आती हो

हर नजर उन पर रहती है महफिल में

बस हमसे ही वो नजर फेर जाते हैं ""बन्धु""

जब भी नजर हमारी उन तक जाती हो

 ""देशबंधु""

 

आशा


वक्त बदला है तो हवा भी बदलेगी

मौसमे -बहार में तय है कि फिज़ा भी बदलेगी

चल छोड़ उदासी हौसला रख

ज़ख्म गहरा  है तो  दवा भी  बदलेगी

रात के लम्बा होने पर लाज़मी है टूट जाना

  सुबह के नूर से तक़दीर भी बदलेगी

 नजर लग गयी है मेरे वतन को

पर नज़र् बट्टू के आने से नजर भी बदलेगी

अब ना खुदा का  ना राम का घर टूटेगा

 अब दिलो के दरमियाँ की हर दीवार टूटेगी

हो ना हो बन्धु"" कभी तो हुक्मरानों की नीयत भी बदलेगी

""देशबंधु""

पलकों के


पलकों के बाँध के पीछे

 कैद दो आंसू

आज

सैलाब ही ले आते

आज

गर आप वर्षों बाद

 रास्ता न बदलते तो

बदल जाती मेरी भी तासीर

 गर आज

 आप रास्ते में न आते

 वक्त बहुत बिताया था

 हमने रास्ते बदलने को

रास्ते बदल ही गए थे

 गर आप

मेरे रास्ते में न आते तो

ये आप का सितम है

या मेरा नसीब

समझ ही नहीं पाता

गर आप आज

 राह में नजर न

 मिलाते तो “

"देशबंधु ""

पलकों के


पलकों के बाँध के पीछे

 कैद दो आंसू

आज

सैलाब ही ले आते

आज

गर आप वर्षों बाद

 रास्ता न बदलते तो

बदल जाती मेरी भी तासीर

 गर आज

 आप रास्ते में न आते

 वक्त बहुत बिताया था

 हमने रास्ते बदलने को

रास्ते बदल ही गए थे

 गर आप

मेरे रास्ते में न आते तो

ये आप का सितम है

या मेरा नसीब

समझ ही नहीं पाता

गर आप आज

 राह में नजर न

 मिलाते तो “

"देशबंधु ""