रविवार, 17 नवंबर 2013

स्वर्गीय मित्र विजय को उसके जन्म दिवस पर श्रद्धा सुमन समर्पित )


स्वर्गीय मित्र विजय को उसके जन्म दिवस पर श्रद्धा सुमन समर्पित )

ये दोस्त बहुत याद आता है तू ..................

तेरा जाना

जिंदगी की खुशबु ले गया

आंशुयो क् एक सिलसिला दे गया

 टूटे शृंख्ला यादों कि

लगता नहीं

बस हमारा अन्दर तक

 टूट जाना पका कर गया

 जीवन को पूरा

जीने की चाहत में

 सबसे आगे रहने कि होड में

तू बहुत दूर चला गया

चाहे भी अब हम

तो तुझे डांट ना पाये

तेरा यू जाना हमे बेबस कर गया

पिछे जो यू छोड कर चले जाते हैं

वो बेबफा पुकारे जाते हैं

बस तेरा यू जाना

तेरा बेबफा होना पक्का कर गया

 तेरा जाना यादों की एक लंबी श्रिंखला दे गया

जाने से तेरे जीवन में शून्य भर गया

ईश्वर से आस्था का बंधन टूट गया

डर लगता है कि कही

तू उधर कशट में ना रहे

 तभी हम मन्दिर तक जाते हैं

 नहीं तो तेरा जाना

हमें ईश्वर से दूर ले गया

 मिल गया तू निरंकार में

कश्टो के इस भम्वर में हमें छोड़ कर

 कहते हैं अछे लोग तो वहा भी चाहे जाते हैं

पर तेरा जाना

इस बात को और पक्का कर गया

गर है कोई और जहाँ

तो हमारे आने तक

मित्रता कि राह ताकते रहना

इस जहाँ से ज्यादा उस जहाँ में

 हमसे मिलना
तेरा जाना यादों की एक लंबी श्रिंखला दे गया.......

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

इतने रिश्तों
इतनी उलझनों के बाद भी
डायरी के कुछ पन्ने
जीवन के उत्तरार्ध में
खाली रहने लगे हैं ...
कुछ लिखे पन्ने
खनकते सिक्कों से थे
कुछ चिर स्थायी
सनाटे कि तरह
दुबके पड़े हैं
न सपनों कि सूची
न पूरा करने कि कोई हड़बड़ी
न चिरंतन की खोज
न मिट जाने का भय
न डायरी के पन्नों में
गुम हो जाने कि चाहत
सुलझ जाये जो गुथी जीवन कि
वो इन्तजार करना
डायरी के खाली पन्नों को
रंगने से अच्छा लगा है
डायरी के कुछ पन्ने खाली रहने लगे हैं
@देशबंधु "

रविवार, 10 नवंबर 2013

न बात करता
न ही बातों में
तुम्हारा जिक्र होता
ये तो दर्द है
जो बार –बार...
नज्म बनकर उतर आता है
तुम्हारा नाम
जुबां पर आ जाए मुमकिन नहीं
पर दर्द का क्या
जो आँखों में छलक आता है
खो जाऊं दूर कहीं
इस जहां के बेगानों में
पर उस ख्याल का क्या
जो हर बार
तुम्हे साथ लिये आता है
मैं तो तुम्हारा ख्याल भी छोड़ देता
पर उस नजम का क्या
जिसके लिए
मैं
आज भी ज़िंदा हूँ........

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

आज भी


आज भी

मेरे देश में

 बेट्टिया पैदा नही कि जाती

 वो तो

उग आती हैं सीता कि तरह

आज भी

 मेरे देश मे

पाली नहीं जाती बेट्टिया

वो तो पल जाती हैं

निगम के कूड़ेदान पर पलने वाले

 कुकरमुत्तो कि तरह

आज भी

मेरे देश में पढ़ती नहीं

भोजन करने स्कूल जाती हैं बेट्टिया

आज भी

मेरे देश में सपने नहीं

उसका परिणाम देखती हैं बेट्टियाँ

इकसवि सदी के भारत में

आज भी नवरात्रो पर पूजी

और फिर

सारा साल नोची जाती है बेट्टियाँ

जी मेरे भारत में

आज भी ब्याही नही

बेची जाती हैं बेट्टियाँ

सौभाग्य नही

आज भी मेरे देश में

 मुशिबत समझी जाती हैं बेट्टिया

"देश्बंधु"

सोमवार, 4 नवंबर 2013

क्या


क्या पूछते हो

पता मेरा

 हैसियत या जात मेरी

मिटटी का शरीर लिए फिरता हूँ

आँशुयों के सैलाब में बहता रहता हूँ

 चंद निबालों कि ख़ातिर

 पूरा पेट लिए फिरता हूँ

है खाली हाथ

पर हर वक़्त

 पाप कि गठरी लिए फिरता हूँ

समझ पाया न आज तक

उसको पर,साथ अपने

विचारों का भार लिए फिरता हूँ

 चल पाऊँ दो कदम

मुशकिल से

 पर दूनिया से होड़ लिए फिरता हूँ

गैरों कि इस दुनिया में

 अकेले रहकर भी

 अपनों का अभिमान लिए फिरता हूँ

 मत पूछ पता मेरा

 नाम बाले इस जहाँ में

बैरंग लिफाफा बना फिरता हूँ ..............

"देशबंधु"