बहुत मुमकिन है
पत्थरों के
इस शहर में
खामोश रहकर
में भी
फना हो जाऊं
जहाँ इतने सारे पत्थर हैं
वहां में भी
पत्थर का खुदा
हो जाऊं
बात अपनी कहने को
घुटन से
पार पाने को
कोशिश जारी है
पथरों के इस शहर में
बेगानों के बीच
पत्थर न बन जाऊं
तभी तो
गाँव की चौपाल
,माँ की रोटी
याद कर लेता हूँ
कितने दिन
यादों के सहारे
पत्थर होने से
बच पाउँगा
मुझे पता है
खो गया हूँ
इन पत्थरों में
पर पता नहीं है तो
बाहर जाने का वो रास्ता
जो सचमुच के खुदा
तक जाता हो……………!

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