सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

इन पत्थरों में


बहुत मुमकिन है

पत्थरों के

 इस शहर में

खामोश रहकर

में भी

फना हो जाऊं

जहाँ इतने सारे पत्थर हैं

वहां में भी

 पत्थर का खुदा

  हो जाऊं

बात अपनी कहने को

घुटन से

 पार पाने को

कोशिश जारी है

पथरों के इस शहर में

बेगानों के बीच

पत्थर बन जाऊं

तभी तो

गाँव की चौपाल

 ,माँ की रोटी

याद कर लेता हूँ

कितने दिन

 यादों के सहारे

पत्थर होने से

 बच पाउँगा

 मुझे पता है

खो गया हूँ

 इन पत्थरों में

पर पता नहीं है तो

बाहर जाने का वो रास्ता

जो सचमुच के खुदा

 तक जाता हो……………!

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