बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

वो टूट रही है-----




अनायास ही बार- बार टूट्ती रही वो

आज भी बार- बार टूट रही है वो

टूटेगी वो फ़िर

वो चट्टान है बार- बार टूट्ती है

उसके टूटने से ना जाने कितने ही

पथरो को  अस्तित्व  मिला

हर बार जब भी पथर  अस्तित्व  मे आया

वो टूटी उसके लिये

उसके टूट्ने से जो पथर अस्तित्व  मे आये

उनको उसके टूट्ने से कोई हमदर्दी नही

वो टूटती रहे उनको क्या?

समाज मे सदियो से टूट- टूट कर वो

चट्टान बन गयी

टूटना उसका धरम बन गया है

कभी-कभी उसने भी टूट्ने मे ही महानता समझी

फ़िर चल पडी परम्परा टूट्ने की

टूटती जाये वो नीम्व की ईट बनने के लिये

कब ये समाज समझ सका उसके टूट्ने की गरिमा

इसी गम मे उसके टुट्ने की आवज आई

देश्बन्धु'"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें