गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

घाव जो दिल पर लगे हैं उन्हें आंसू बनकर बह जाने दो अभी मत छेड़ो नए नग़मे तुम पुरानी ग़ज़ल को रूह तक उतर जाने तो दो अभी मत लिखो नयी इबारत तुम हथेलिओं की लकीरों को थोड़ा और उलझ जाने तो दो बरसों तक बसा रहा चेहरा जो दिल में उसे थोड़ा धुंधला हो जाने तो दो मत देख ख़्वाब नए तू अभी बरसों देखे जो ख़्वाब हमने मिलकर रूह से मेरी उन ख़्वाबों को निकल जाने तो दो ………………………………..|"देशबंधू"

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