बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

खामोश पन्नों पर जब भी अपना ग़म उकेरना चाहता हूँ पता नहीं क्यों? तेरा सैलाब में डूबा चेहरा सामने आता है खामोश सा मेरा ये दिल हर बार क्यों ? तेरे गुनाहों की सज़ा पाता है पूछता हूँ दिल से जो सवाल फिर से वो सवाल ही बनकर मेरे सामने क्यों ?आता है करीब आते जब भी तुम पता नहीं हर बार मुझे ही दरमियाँ हमारे फासला नजर क्यों ? आता है आसमां में तारे बेहिसाब हैं फिर मुझे ही ना जाने क्यों ? टूटता तारा ही नज़र आता है क्या ? लगाएं हिसाब मुहब्ब्बत का मुझे तो हर बार अपने खाते में घाटा ही घाटा नज़र आता है.......................... देशबन्धु (टी. जी. टी.आर्ट्स )शिक्षा विभाग हिमाचल प्रदेश १ (सर्वाधिकार सुरक्षित )

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