बुधवार, 8 अक्टूबर 2014
बेजार हूँ
बेजार हूँ तेरी दुनिया से
आकर यहां हमने क्या पाया
घूटी -घूटी साँसे और ग़मों का साया
गुजरा जो भी लम्हा हमें
जखम गहरे दे गया
आज हम तुम्हे
जखम गहरे दिखाएँगे
तेरी आँखों की तो बात ही क्या
पत्थर भी रोने लग जाएंगे
टूटा जो
आज खँडहर बनकर
अंजाम है तेरी ठोकरों का
कभी वो आलिशान मकां था
मेरी हसरतों का
कैसी ये मजबूरी है
एक सपने की खातिर हम
तन्हाई का बोझ ढोते हैं
मर तो कब के गए थे
तेरे लिए ही अपनी लाश ढोते हैं
कभी जो घर था तेरा
मेरा वो दिल
आज पीड़ा की मंडी है
उतर जाती जो खुमारी
तो हम भी जी लेते
वरना तो "वन्धु"छोड़ जाऊं दुनिया
इसी में अकलमंदी है ........................
देशबन्धु(टी.जी.टी.आर्ट्स )हिमाचल शिक्षा विभाग
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क्या बात है ... बहुत खूब लिखा है ...
जवाब देंहटाएंआभार दिगंबर जी सनेह बनाये रखें
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