मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

तारों की बस्ती में चाँद तनहा सा क्यों है ? पूछूं में तेरे दिल से कोई सवाल ये अरमान सा क्यों है ? बहारों के मौसम में बुझा बुझा सा गुलिस्तां और परेशान सा गुलफाम क्यों है ? वक़्त सरक गया जो हाथों से फिर मेरे हाथों की लकीरों में फिर तेरा नाम आज भी क्यों है ? मिट्ने का मेरे कोई हिसाब न था गुनहगारों में तेरा नाम आज भी क्यों है गुजर गयी रात चांदनी अलसाया सा चाँद क्यों है ? बहारों के इस मौसम में बंधू तू उदास सा क्यों है?

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