मंगलवार, 9 दिसंबर 2014
लड़खड़ाते मेरे कदम
माँ तेरी उंगली ढूंढ़ते हैं
संभल जब नहीं पाते
तो तुझे ढूंढ़ते हैं
नफरत से भरे इस जहाँ में
न जाने
आज भी हम माँ को क्यों ढूंढते हैं ?
जमाने की ठोकरों की
क्या बिसात ?
मिटा दे जो बजूद मेरा
आज भी हम
माँ की दुआ का असर ढूंढते हैं
है गर ज़माना
शातिरों का रहनुमा
तो क्या ?
आज भी हम माँ में
भगवान का अक्स ढूंढते हैं
है तलाश जिन्हें शानो -शौकत की
खुदा उन पर करम करे
हम तो "बंधू " सदा
माँ के चरणों में जन्नत ढूंढते हैं
देशबन्धु (टी.जी. टी. आर्ट्स )
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माँ के चरणों में जन्नत होती है ... उसका सहारा ही सच्चा सहारा होता है शायद इसलिए उसे कदम कदम पे ढूंढते हैं ...
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