चाहे मेरा मन पिछे मुड़ जाऊँ
एक बार फिर पाठ्शाला जाऊँ
सबक जिंदगी का जो ग़लत पढ लिया
उसे दुरुस्त कर आऊ
वक्त जो फिसल गया था रेत बनकर
फिसलने ना दूं साथ उसके दौड़ पाऊँ
चाहे मेरा मन पिछे मुड़ जाऊँ
सपनो का एक नया पन्ना हो
और हर एक हर्फ को में जी पाऊँ
छूट गए जो चलते- चलते
सभी
को साथ लेकर चल पाऊँ
बन्धु"" बदल दूं जिंदगी के हर लफ्ज
को
जो गया वक्त लौटा पाऊँ
देशबंधु""

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