रविवार, 13 अक्टूबर 2013

वक्त


चाहे मेरा मन पिछे मुड़ जाऊँ

एक बार फिर पाठ्शाला जाऊँ

सबक जिंदगी का जो ग़लत पढ लिया

उसे दुरुस्त कर आऊ

वक्त जो फिसल गया था रेत बनकर

फिसलने ना दूं साथ उसके दौड़ पाऊँ

चाहे मेरा मन पिछे मुड़ जाऊँ

सपनो का एक नया पन्ना हो

और हर एक हर्फ को में जी पाऊँ

छूट गए जो चलते- चलते

 सभी को साथ लेकर चल पाऊँ

बन्धु"" बदल दूं जिंदगी के हर लफ्ज को

जो गया वक्त लौटा पाऊँ

देशबंधु""

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