सुख के साथ
दुःख की गति
अनवरत है
एक के साथ
दुसरे का आना
नियति है
सिक्के के दो पहलू हैं
ये
उछालोगे कभी तो
हर दूसरी बार
चित के साथ पट भी होगी
सुख के आने पर
दुःख दूर तक दिखता नहीं
भ्रम होता है ये
वो तो
कभी अकेला रहता नहीं
कभी जब
अपनों का दिया जख्म हरा हो
तो उसकी इन्तहा होती है
वरना
तो जिंदगी को
इसकी आदत सी हो जाती है ............
."देशबंधु"
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