सोमवार, 4 नवंबर 2013

क्या


क्या पूछते हो

पता मेरा

 हैसियत या जात मेरी

मिटटी का शरीर लिए फिरता हूँ

आँशुयों के सैलाब में बहता रहता हूँ

 चंद निबालों कि ख़ातिर

 पूरा पेट लिए फिरता हूँ

है खाली हाथ

पर हर वक़्त

 पाप कि गठरी लिए फिरता हूँ

समझ पाया न आज तक

उसको पर,साथ अपने

विचारों का भार लिए फिरता हूँ

 चल पाऊँ दो कदम

मुशकिल से

 पर दूनिया से होड़ लिए फिरता हूँ

गैरों कि इस दुनिया में

 अकेले रहकर भी

 अपनों का अभिमान लिए फिरता हूँ

 मत पूछ पता मेरा

 नाम बाले इस जहाँ में

बैरंग लिफाफा बना फिरता हूँ ..............

"देशबंधु"

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