क्या पूछते हो
पता मेरा
हैसियत या जात मेरी
मिटटी का शरीर लिए फिरता हूँ
आँशुयों के सैलाब में बहता रहता हूँ
चंद निबालों कि ख़ातिर
पूरा पेट लिए फिरता
हूँ
है खाली हाथ
पर हर वक़्त
पाप कि गठरी लिए
फिरता हूँ
समझ पाया न आज तक
उसको पर,साथ अपने
विचारों का भार लिए फिरता हूँ
चल पाऊँ दो कदम
मुशकिल से
पर दूनिया से होड़ लिए
फिरता हूँ
गैरों कि इस दुनिया में
अकेले रहकर भी
अपनों का अभिमान लिए
फिरता हूँ
मत पूछ पता मेरा
नाम बाले इस जहाँ में
बैरंग लिफाफा बना फिरता हूँ ..............
"देशबंधु"
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